Papa Aur Main

पापा और मैं

हर बार जब मैं बंबई का घर छोड़कर

दिल्ली आती हूँ,

अपनी आँखों की नमी को

बड़ी सी मुस्कान के पीछे

बख़ूबी छिपातीं हूँ ।

पापा कहीं मेरी उदासी न देखें

यही डर मन में रहता है,

आख़िर बेटी का घर बसाने हर पिता

ये बिछड़ने का दुख हँसकर जो सहता है!

जानती हूँ मैं तो अपने भरे पूरे घर मुड़कर ससुराल जाती हूँ

पर जाने से मेरे पापा का आँगन हर बार सूना कर आती हूँ।

अकेले होकर भी पापा “मैं बिलकुल अच्छा हूँ”, हर बार यू कहते हैं,

इक घर में नहीं तो क्या हुआ हम इक दूसरे के दिल में हमेशा संग रेहते है !

– सोनाली बक्क्षी

०९/०७/२०२१

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