ज़िंदगी

समय-समय पर रिश्ते बनते हैं, अकस्मात् ही पंछी बन उड़ जाते हैं, ‘मिलना’ चाहें हम ख़ुद चुनते हैं, बिछड़ने पर नियंत्रण किसी का न रहे । जिसकी न की हो कभी कल्पना, अनुभव उसका हर रोज़ करवाती हैं, ये किताब नहीं ज़िंदगी हैं साहब ये अलग ही रंग दिखलाती हैं । सही-ग़लत, काला- सफ़ेद, भिन्न प्रकार हैं, हैं भेद कई, पर जीवन का आचरण है … Continue reading ज़िंदगी